सर्वसिद्धी अनुष्ठान केन्द्र, उज्जैन के बारे में-

जन्मपत्रिका में कुछ दोष ऐसे भी होते हैं जिनसे मुक्ति अथवा शांति के लिये हमें पूजा-पाठ (कर्मकांड) का सहारा लेना पड़ता है! इसके तहत हमारे द्वारा विश्व-प्रसिद्ध उज्जैन शहर में सर्वसिद्धी अनुष्ठान केन्द्र स्थापित किया है! यह अनुष्ठान केन्द्र उज्जैन शहर की शिप्रा नदी के समीप रामघाट पर स्थित है! शिप्रा नदी में अमृत गिरा था, ऐसा शास्त्रों में उल्लेख मिलता है! इसलिए शिप्रा नदी के तट पर की गई पूजा-आराधना सिद्ध होती हैं!

सर्वसिद्धी अनुष्ठान केन्द्र, उज्जैन में विभिन्न प्रकार की पूजाओं के लिए कुशल वेदिक पंडितों की टीम गठित की गई है! जातक अपनी सुविधानुसार यहां स्वयं आकर अथवा ऑनलाइन माध्यम से भी पूजा-अनुष्ठान संपन्न करवा सकते हैं! वेदिक पंडितों की यह टीम देश के किसी भी शहर में जाकर भी पूजा-अनुष्ठान संपन्न कर सकती हैं!

बहुत से पंडित विभिन्न दोषों का पूजा करके बोल देते हैं कि हो गया दोष समाप्त! सर्वसिद्धी संस्थान का मानना है कि जन्मपत्रिका के दोषों का एक बार पूजा करा लेने से दोष का सौ फीसदी उपचार हो गया इसका कोई ना सांटिफिक टेस्टिंग है और ना ही अन्य कोई पैमाना! अतः अपनी रिसर्च के तहत हम इस परिणाम पर पहुंचे हैं कि यदि पत्रिका में कोई दोष हैं, तो उसके लिये आजीवन उपाय करने होंगे! लगातार कुछ वर्षों तक उपाय करने से भी परिणामों में शुभता दिखाई देने लगती है! अतः सर्वसिद्धी संस्थान अपने क्लाइंस को यह सुझाव देता है कि कम से कम एक साल तक विभिन्न दोषों हेतु पूजा करवायें! सर्वसिद्धी संस्थान कम खर्च में आपके उपरोक्त संकल्प को प्रति माह पूरा करने में आपकी मदद कर सकता है!

 

 

मॉं बगलामुखी अनुष्ठान-

मॉं बगलामुखी की महिमा के बारे मेें लिखना सूरज के आगे दिया दिखाने जैसा है! दस महाविद्याओं के आठवें क्रम में माता बगलामुखी का नाम आता है! इन्हें पीताम्बरा देवी के नाम से भी जाना जाता है! एक हाथ से राक्षस की जिव्हा को कीलित किए हुए तथा दूसरे हाथ से शस्त्र द्वारा उस पर मारण की मुद्रा में देवीजी का स्वरूप है!
वर्तमान समय में चारों ओर गला काट प्रतिस्पर्धा है! हमें नहीं पता कि विरोधी कब अपने व्यावसायिक स्वार्थ एवं कुंठा के चलते किस रूप से हमें प्रभावित कर दे अथवा क्षति पहुंचा दे! ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे जिसमें अगर एक व्यक्ति फलता-फूलता है, तो ना सिर्फ उसके पडौसी, बल्कि उसके स्वयं के रिश्तेदार तक उससे जलने लगते हैं! ऐसे में हमें एक शक्ति की जरूरत पडती है जो हमारे पूरे परिवार की सभी प्रकार से रक्षा करे! और उस शक्ति का नाम है मॉं बगलामुखी!

 

मॉं बगलामुखी अनुष्ठान समस्त ज्ञात, अज्ञात बाधा, काला जादू, नजरदोष, नकारात्मकता, शत्रु बाधा, कोर्टकेस इत्यादि में प्रभावी होता है! इसके अलावा व्यापार हानी अथवा अन्य रूकावट, बीमारी लंबे समय तक पीछा नहीं छोड रही हो, कर्ज का पहाड-सा चढ गया हो अथवा जीवन में कोई मार्ग ना दिख रहा हो, ऐसे में सच्ची श्रद्धा से माता की शरण लेना निश्चित रूप से कल्याणकारी होता है! यहां यह भी उल्लेख करना चाहेंगे कि किसी भी पूजा-अनुष्ठान के उददेश्य के सात्विक एवं श्रद्धामय होने परिणाम शीघ्र एवं अच्छे प्राप्त होते हैं!

अष्ट लक्ष्मी अनुष्ठान-

शास्त्रों में लक्ष्मीजी के अष्ट स्वरूप का वर्णन आता है जिन्हें अष्टलक्ष्मी के नाम से जाना जाता है! अष्टलक्ष्मी स्वरूपों के नाम क्रमशः गज लक्ष्मी, वीर (धैर्य) लक्ष्मी, विजया (जया) लक्ष्मी, आदि (महा) लक्ष्मी, धन लक्ष्मी, धान्य लक्ष्मी, विद्या लक्ष्मी तथा संतान लक्ष्मी हैं! माता लक्ष्मी की विशेष कृपा पाने के लिए उपरोक्त अष्टलक्ष्मी अनुष्ठान किया जाता है! व्यापारिक वर्ग के लिए अति उपयोगी!

 

पंचदेव पूजन (प्रतिदिन)-

शास्त्रों के अनुसार सभी व्यक्तियों को पंचदेव यानी गणेश, शिव, शक्ति, विष्णू एवं सूर्यदेव का प्रतिदिन पूजन करना चाहिए! हम यदि गौर करें तो इन्हीं पंचदेवों ने मुख्य रूप से शिव, शक्ति एवं विष्णुजी ने ज्यादातर अवतार लेकर संसार एवं प्राणीमात्र की रक्षा की है! गणेशजी तो हैं ही प्रथम पूजनीय एवं विघ्नहर्ता और सूर्यदेव प्रत्यक्ष दिखने वाले कल्याणकारी देव हैं! इसलिए भी सभी देवों में उपरोक्त पंचदेवों की पूजा की महत्ता बताई गई है! कई बार व्यक्ति अपनी प्रतिदिन की व्यवस्ताओं और वेदिक ज्ञान-विधि के अभाव में उपरोक्त पंचदेवों की पूजा प्रतिदिन नहीं कर पाता! इस कारण भी उनके जीवन में संघर्ष की अधिकता रहती है! व्यक्ति को चाहिए कि प्रतिदिन विधि-विधान से उपरोक्त पंचदेवों प्रातः पूजन करें! अन्यथा उपरोक्त पूजन प्रतिदिन के आधार पर सर्वसिद्धी संस्थान द्वारा भी करवाया जा सकता है! जिसकी दक्षिणा बहुत कम रखी गई है!

 

पित्रदोष शांति-

पित्र दोष जिसे पूर्वजन्म के दोष के रूप में गिना जाता है, जीवन में कठिनाईयां देता देखा गया है! ज्योतिष विद्वान इसे राहू एवं शनिजनित दोष बताते हैं! बिना जन्मपत्रिका के अध्ययन के भी, प्राप्त संकेतों से यह स्पष्ट हो जाता है कि व्यक्ति के ऊपर पित्रदोष है या नहीं! क्योंकि जिस व्यक्ति के पर पित्रदोष का प्रभाव होता है, उसका स्वयं का विवाह एवं परिवार में मांगलिक कार्य काफी देरी से होते हैं अथवा होते ही नहीं! परिवार सदस्यों के बीच अक्सर क्लह एवं लडाई की स्थिति बनी रहती है! उम्र के बीच के पडाव 35 से 40 के आसपास यकायक नौकरी छूट जाती है, बिजनेस में घाटा हो जाता, जीवन में निरसता एवं उत्साह का अभाव जान पडता है! संतान नहीं होती अथवा काफी प्रयासों के बाद होती है! दोष का प्रभाव ज्यादा होने पर चोरी एवं अग्नि से नुकसान भी होता देखा गया है!

 

कालसर्प दोष निवारण-

कालसर्प दोष राहू एवं केतू के मध्य में अन्य ग्रहों के आने से बनता है! कुल मिलाकर राहू एवं केतू मिलकर बाकी ग्रहों को बांध देते हैं, शुभग्रहों के प्रभाव एवं योग में भी कमी करते हैं! जन्मपत्रिका के अलग-अलग भावोंं में राहू एवं केतू की उपस्थिति होने से यह 12 प्रकार के कालसर्प दोषों का निर्माण होता है! कालसर्प योग की शांति करवाने से कभी-कभी यह दोष, योग में बदलकर व्यक्ति को काफी प्रगति भी करवा देता है! अन्यथा जीवन में लगातार संघर्ष एवं अपमान भी देता देखा गया है! इस दोष के कारण व्यक्ति के बहुत से गुप्त शत्रु सक्रिय रहते है जो किसी ना किसी रूप में व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए प्रयासरत रहते हैं! इसके अलावा जीवन में यकायक घटनाएं जैसे घटना-दुर्घटना-स्थानांतरण होते रहते हैं!

 

मंगल दोष-

मंगल ग्रह की उपस्थिति जन्मपत्रिका के पहले, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम अथवा बारहवें भाव में होने कारण मांगलिक दोष बन जाता है! कभी-कभी यह दोष व्यक्ति को अत्यधिक क्रोधी एवं जिददी बना देता है! मंगल के प्रभाव स्वरूप ऐसे व्यक्तियों को चोट लगने का भी खतरा बना रहता है! वैवाहिक जीवन में तो इस दोष की भूमिका नजरअंदाज ही नहीं की जा सकती! मंगल चूंकि रक्त का कारक है अतः रक्त संबंधी बीमारी भी उपरोक्त दोष वाले व्यक्ति को हो सकती है! उपरोक्त के अलावा यदि छटवें भाव में भी मंगल है, तो हालांकि मंगलदोष तो नहीं लगतार, लेकिन परिणाम उपरोक्त लिखे बिंदुओं के अनुसार प्राप्त हो सकते हैं! महिलावर्ग में यह दोष अधिक मात्रा में मासिकधर्म देने वाला होता है! अतः व्यक्ति को चाहिए कि इस दोष की विधिविधान से शांति करवा लेनी चाहिए! 28 वर्ष के उपरांत मंगल दोष का प्रभाव नहीं रहता, यह कोरी कल्पना है! मंगल ग्रह का जन्म स्थान उज्जैन नगरी ही है, अतः मंगल दोष की शांतिकर्म के लिए उज्जैन सर्वोत्तम स्थान है!

 

महामृत्युंजय यज्ञ-

महामृत्युंजय जिसे संजीवनि भी कहते हैं, व्यक्ति-विशेष के स्वास्थ्य लाभ एवं प्राणों की रक्षा के लिए इस यज्ञ का सहारा
लिया जाता है! यह यज्ञ अकाल मृत्यु को हरता है तथा एक्सीडेंट इत्यादि से रक्षा करता है! साथ ही यदि संबंधित व्यक्ति की आयु पूरी हो गई है तो यह यज्ञ आसानी उसे मुक्ति दिलाने में भी सहायक होता है!

 

साढेसाती ढईया शनि अनुष्ठान

शनि की ढईया यानी संबंधित व्यक्ति पर शनि का अगले ढाई वर्ष तक प्रभाव रहेगा! शनि की साढेसाती यानी संबंधित व्यक्ति पर शनि का प्रभाव अगले साढे सात वर्षों तक रहने वाला है! हालांकि अलग-अलग व्यक्तियों पर इसका प्रभाव अलग-अलग होता है! फिर भी मोटे तौर पर यह मानसिक स्थिति, स्वास्थ्य, रोजगार को सीधे तौर पर प्रभावित करता देखा गया है! साथ ही, उपरोक्त अवधि में कलह एवं कोर्ट केस की स्थिति भी पैदा होती देखी गई है! शनिशांति से निश्चित रूप से जातक शांति का अनुभव करता है! वर्तमान में मकर, धनु एवं वृश्चिक राशि के व्यक्तियों पर शनि की साढेसाती चल रही है! जबकि कन्या एवं बृषभ राशि के व्यक्यिों पर ढईया चल रही है!

 

गुरू चांडाल दोष निवारण-

जन्मपत्रिका के किसी भी भाव में गुरू एवं राहू के एक साथ रहने पर, गुरू चांडाल दोष का निर्माण होता है! यह दोष खराब दोषों में गिना जाता है! कुल मिलाकर इस दोष के चलते गुरू अपने शुभ परिणाम नहीं दे पाता, जिस कारण संबंधित जातक का स्वास्थ्य अच्छा ना होना, विवाह होने में परेशानी, विवाह यदि हो चुका है तो वैवाहिक जीवन में परेशानी, जीवन में संघर्ष, पैसों एवं मान की कमी इत्यादि चीजें हो सकती हैं!

 

संतान गोपाल पूजा

काफी प्रयासों के बाद भी यदि संतान होने में बाधा हो रही है, तो शास्त्रों में संतान गोपाल पूजा का विधान आता है! इससे संतान होने में जो बाधा आ रही है, वह दूर होती है! साथ ही गर्भवती महिलाएं यदि संतान गोपाल पूजा करवाती हैं, तो भगवतकृपा से श्रेष्ठ एवं आज्ञाकारी संतान होने के योग बनते है!

 

नवग्रह शांति-

ग्रहों के ब्रांहाड में घूमने की प्रक्रिया को वेदिक ज्योतिष में ग्रहों का गौचर कहा जाता है! इस प्रक्रिया में ग्रह अलग-अलग नक्षत्रों एवं राशियों में घूमते हुए संबंधित व्यक्ति को अलग-अलग फल प्रदान करते है! यह फल शुभ भी हो सकते हैं एवं अशुभ भी! अतः व्यक्ति को चाहिए कि वर्ष में एक से दो बार नवग्रह शांति करवा लेनी चाहिए!

 

मूल नक्षत्र शांति-

यदि शिशु का जन्म क्रमशः ज्येष्ठा, मूल, आश्लेषा, रेवती, मघा तथा अश्विनी नक्षत्र में हो, तो उपरोक्त नक्षत्रों की शांति का विधान शास्त्रों में आता है! मुख्य रूप से यह शांति पूजा जन्म से लगभग सत्ताईसवें दिन जब पुनः वही नक्षत्र आता है, तब करवाई जाती है! यदि किसी व्यक्ति का जन्म उपरोक्त नक्षत्रों में हुआ है और उसके परिवाजनों द्वारा शांति नहीं करवाई, तो उन्हें जब भी इस दोष का पता चले, यह शांति करवा लेनी चाहिए! उल्लेखनीय है कि जन्मनक्षत्र की हमारे संपूर्ण जीवन में विशेष भूमिका रहती है!

 

वास्तु पूजन-

वास्तु पूजा मुख्य रूप से जब गृह प्रवेश अथवा कार्यस्थल की शुरूआत के समय करवाई जाती है! इसमें विधि-विधान से वास्तुदेव की पूजा की जाती है ताकि संबंधित प्रॉपर्टी में निवासरत वास्तुदेव प्रसन्न होकर वहां निवास करने वाले सभी व्यक्तियों पर प्रसन्न रहें!

 

अखंड रामायण पाठ-

समस्त प्रकार के मंगल का प्रदाता तथा अमंगलों को हरने वाला अखंड रामायण का पाठ है! ऐसी मान्यता है कि जहां एवं जब भी अखंड रामायण पाठ होता है, इसे सुनने के लिए श्री हनुमानजी स्वयं उपस्थित रहते हैं एवं पाठ को सुनने एवं करवाने वाले व्यक्ति को आशीर्वाद देते हैं! इस पाठ का नियम होता है कि संपूर्ण रामायण का परायण 24 घंटे चलता है यानी एक दिन में यह सपन्न हो जाना चाहिए!

 

सुंदरकांड का पाठ-

रामायण का पंचम अध्याय सुंदरकांड कहा जाता है! इस अध्याय में श्रीहनुमानजी के पराक्रम का वर्णन है! ऐसा माना जाता है इस पाठ को करवाने से तथा श्रवण से हमारे पराक्रम एवं तेज में वृद्धि होती है तथा समस्त प्रकार के रोग, दोष एवं अरिष्टों से रक्षा होती है!

 

श्री भैरव अनुष्ठान-

भैरव अनुष्ठान समस्त प्रकार के डर, फोबिया, ऊपरी बाधा, अनजान दोष को दूर करता है! साथ ही शनि, राहू एवं केतु जैसे कूर ग्रहों की दशा-अंतरदशा में प्राप्त हो रहे कष्टों से भी रक्षा होती है!

 

भैरव अनुष्ठान समस्त प्रकार के डर, फोबिया, ऊपरी बाधा, अनजान दोष को दूर करता है! साथ ही शनि, राहू एवं केतु जैसे कूर ग्रहों की दशा-अंतरदशा में प्राप्त हो रहे कष्टों से भी रक्षा होती है!

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